रामायण की कहानी Full Story of Ramayan in Hindi
रामायण एक संस्कृत महाकाव्य है जिसकी रचना महर्षि वाल्मीकि ने की थी। दोस्तों यह भारतीय साहित्य के दो विशाल महाकाव्यों में से एक है, जिसमें दूसरा महाकाव्य महाभारत है। हिंदू धर्म में रामायण का एक महत्वपूर्ण स्थान है जिसमें हम सबको रिश्तो के कर्तव्यों को समझाया गया है। रामायण महाकाव्य में एक आदर्श पिता, आदर्श पुत्र, आदर्श पत्नी, आदर्श भाई, आदर्श मित्र, आदर्श सेवक और आदर्श राजा को दिखाया गया है। इस महाकाव्य में भगवान विष्णु के रामावतार को दर्शाया गया है उनकी चर्चा की गई है। रामायण महाकाव्य में 24000 छंद और 500 सर्ग हैं जो कि 7 भागों में विभाजित हैं।
बालकांड Bala Kanda
बहुत समय पहले की बात है सरयू नदी के
किनारे कोशला नामक राज्य था जिसकी राजधानी अयोध्या थी। अयोध्या के राजा का
नाम दशरथ था, जिन की तीन पत्नियां थी। उनके पत्नियों का नाम था कौशल्या,
कैकई और सुमित्रा। राजा दशरथ बहुत समय तक निसंतान थे और वह अपने सूर्यवंश
की वृद्धि के लिए अर्थात अपने उत्तराधिकारी के लिए बहुत चिंतित थे। इसलिए
राजा दशरथ ने अपने कुल गुरु ऋषि वशिष्ठ की सलाह मानकर पुत्र कमेस्टि यज्ञ
करवाया, उस यज्ञ के फलस्वरुप राजा दशरथ को चार पुत्र प्राप्त हुए। उनकी
पहली पत्नी कोशल्या से प्रभु श्री राम, कैकई से भारत और सुमित्रा से
लक्ष्मण और शत्रुघ्न का जन्म हुआ। उनके चारों पुत्र दिव्य शक्तियों से
परिपूर्ण और यशस्वी थे। उन चारों को राजकुमारों की तरह पाला गया, और उनको
शास्त्रों और युद्ध कला की कला सिखाई गई। Full Story of Ramayan in Hindi
जब प्रभु श्री राम 16 वर्ष के हुए तब एक
बार ऋषि विश्वामित्र राजा दशरथ के पास आए और अपने यज्ञ में विघ्न उत्पन्न
करने वाले राछसों के आतंक के बारे में राजा दशरथ को बताया और उनसे सहायता
मांगी। ऋषि विश्वामित्र की बात सुनकर राजा दशरथ उनकी सहायता करने के लिए
तैयार हो गए और अपने सैनिक उनके साथ भेजने का आदेश दिया, पर ऋषि
विश्वामित्र ने इस कार्य के लिए राम और लक्ष्मण का चयन किया। राम और
लक्ष्मण ऋषि विश्वामित्र के साथ उनके आश्रम जाते हैं, और उनके यज्ञ मैं
विघ्न डालने वाले राक्षसों का नाश कर देते हैं। इससे ऋषि विश्वामित्र
प्रसन्न होकर राम और लक्ष्मण को अनेक दिव्यास्त्र प्रदान करते हैं जिनसे
आगे चलकर प्रभु श्रीराम और लक्ष्मण अनेक दानवों का नाश करते हैं।
अयोध्याकांड Ayodhya Kanda
राम और सीता के विवाह को 12 वर्ष बीत गए थे और अब राजा दशरथ वृद्ध हो गए थे। वह अपने बड़े बेटे राम को अयोध्या के सिहासन पर बिठाना चाहते थे। तब एक शाम राजा दशरथ की दूसरी पत्नी का कैकई अपनी एक चतुर दासी मंथरा के बहकावे में आकर राजा दशरथ से दो वचन मांगे.. “जो राजा दशरथ ने कई वर्ष पहले कई कई द्वारा जान बचाने के लिए कैकई को दो वचन देने का वादा किया था” कैकई ने राजा दशरथ से अपने पहले वचन के रूप में राम को 14 वर्ष का वनवास और दूसरे वचन के रूप में अपने पुत्र भरत को अयोध्या के राज सिहासन पर बैठाने की बात कही। कैकई की इन दोनों वचनों को सुनते ही राजा दशरथ का दिल टूट गया और वह कैकई को अपने इन वचनों पर दोबारा विचार करने के लिए बोले, और बोले कि हो सके तो अपने यह वचन वापस ले ले। पर कैकई अपनी बात पर अटल रही, तब ना चाहते हुए भी राजा दशरथ मे अपने प्रिय पुत्र राम को बुलाकर उन्हें 14 वर्ष के लिए वनवास जाने को कहा।
राम ने अपने पिता राजा दशरथ का बिना कोई
विरोध किए उनकी आदेश स्वीकार कर लिया। जब सीता और लक्ष्मण को प्रभु राम के
वनवास जाने के बारे में पता चला तो उन्होंने भी राम के साथ वनवास जाने की
आग्रह किया, जब राम ने अपनी पत्नी सीता को अपने साथ वन ले जाने से मना किया
तब सीता ने प्रभु राम से कहा कि जिस वन में आप जाएंगे वही मेरा अयोध्या
है, और आपके बिना अयोध्या मेरे लिए नरक सामान है। लक्ष्मण के भी बहुत आग्रह
करने पर भगवन राम ने उन्हें भी अपने साथ वन चलने की अनुमति दे दी। इस
प्रकार राम सीता और लक्ष्मण अयोध्या से वन जाने के लिए निकल गए। अपने प्रिय
पुत्र राम के वन जाने से दुखी होकर राजा दशरथ ने अपने प्राण त्याग दिए।
इस दौरान भरत जो अपने मामा के यहां
(ननिहाल) गए हुए थे,वह अयोध्या की घटना सुनकर बहुत ही ज्यादा दुखी हुए।
भारत ने अपनी माता कैकई को अयोध्या के राज सिंहासन पर बैठने से मना कर दिया
और वह अपने भाई राम को ढूंढते हुए वन में चले गए। वन में जाकर भरत राम
लक्ष्मण और सीता से मिले और उनसे अयोध्या वापस लौटने का आग्रह किया तब राम
ने अपने पिता के वचन का पालन करते हुए अयोध्या वापस नहीं लौटने का प्रण
किया। तब भारत ने भगवान राम की चरण पादुका अपने साथ ले कर अयोध्या वापस लौट
आए, और राम की चरण पादुका को अयोध्या के राजसिंहासन पर रख दिया, भरत राज
दरबारियों से बोले कि जब तक भगवान राम वनवास से वापस नहीं लौटते तब तक उन
की चरण पादुका अयोध्या के राज सिंहासन पर रखा रहेगा और मैं उनका एक दास
बनकर यह राज चलाऊंगा।
अरण्यकांड Aranya Kanda
भगवान राम के वनवास को 13 बरस बीत गए थे
और वनवास का अंतिम वर्ष था। भगवान राम, सीता और लक्ष्मण गोदावरी नदी के
किनारे जा रहे थे, गोदावरी के निकट एक जगह सीता जी को बहुत पसंद आई उस जगह
का नाम था पंचवटी। तब भगवान राम अपनी पत्नी की भावना को समझते हुए उन्होंने
वनबास का शेष समय पंचवटी में ही बिताने का निर्णय लिया और वहीं पर वह
तीनों कुटिया बनाकर रहने लगे। पंचवटी के जंगलों में ही एक दिन शूर्पणखा
नाम की राक्षस औरत मिली और वह लक्ष्मण को अपने रूप रंग से लुभाना चाहती थी,
जिसमें वह असफल रही तो उसने सीता को मारने का प्रयास किया, तब लक्ष्मण ने
सूर्पनखा को रोकते हुए उसके नाक और कान काट दिए। जब इस बात की खबर शूर्पणखा
के राक्षस भाई खर को पता चली तो वह अपने राक्षस साथियों के साथ राम,
लक्ष्मण सीता जिस पंचवटी में कुटिया बनाकर रह रहे थे वहां पर उसने हमला कर
दिया, भगवान राम और लक्ष्मण ने खर और उसके सभी राक्षसों का बद्ध कर
दिया। Full Story of Ramayan in Hindi
जब इस घटना की खबर सूर्पनखा के दूसरे भाई
रावण तक पहुंची तो उसने राक्षस मारीचि की मदद से भगवान राम की पत्नी सीता
का अपहरण करने की योजना बनाई। रावण के कहने पर राक्षस मरीचि ने स्वर्ण मृग
बनकर सीता का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। स्वर्ण मिर्ग की सुंदरता पर
मोहित होकर सीता ने राम को उसे पकड़ने को भेज दिया। भगवान राम रावण की इस
योजना से अनभिज्ञ थे क्योंकि भगवान राम तो अंतर्यामी थे, फिर भी अपनी पत्नी
सीता की इच्छा को पूरा करने के लिए वह उस स्वर्ण मिर्ग के पीछे जंगल में
चले गए और माता सीता की रक्षा के लिए अपने भाई लक्ष्मण को बोल दिए। कुछ समय
बाद माता सीता ने भगवान राम की करुणा भरी मदद की आवाज सुनाई पड़ी तो माता
सीता ने लक्ष्मण को भगवान राम की सहायता के लिए जबरदस्ती भेजने लगी।
लक्ष्मण ने माता सीता को समझाने की बहुत कोशिश की कि भगवान राम अजय हैं, और
उनका कोई भी कुछ नहीं कर सकता, इसलिए लक्ष्मण अपने भ्राता राम की आज्ञा का
पालन करते हुए माता सीता की रक्षा करना चाहते थे।
लक्ष्मण और माता सीता में बात इतनी बढ़ गई
कि सीताजी ने लक्ष्मण को वचन देकर भगवान राम की सहायता करने के लिए
लक्ष्मण को आदेश दे दिया। लक्ष्मण माता सीता की आज्ञा मानना तो चाहते थे
लेकिन वह सीता को कुटिया में अकेला नहीं छोड़ना चाहते थे इसलिए लक्ष्मण
कुटिया से जाते वक्त कुटिया के चारों ओर एक लक्ष्मण रेखा बनाई, ताकि कोई भी
उस रेखा के अंदर नहीं प्रवेश कर सके और माता सीता को इस रेखा से बाहर नहीं
निकलने का आग्रह किया। और फिर लक्ष्मण भगवान राम की खोज में निकल पड़े।
इधर रावण जो घात लगाए बैठा था जब उसने से रास्ता साफ देखा तब वह एक साधु का
वेश बनाकर माता सीता की कुटिया के आगे पहुंच गया और भिक्षा मांगने लगा।
माता सीता रावण जो कि एक साधु के वेश में था उसकी कुटिलता को नहीं समझ पाई
और उसके भ्रमजाल में आकर लक्ष्मण की बनाई गई लक्ष्मण रेखा के बाहर कदम रख
दिया और रावण माता सीता को बलपूर्वक उठाकर ले गया।
जब रावण सीता को बलपूर्वक अपने पुष्पक
विमान में ले जा रहा था तो जटायु नाम का गिद्ध ने उसे रोकने की कोशिश की,
जटायु ने माता सीता की रक्षा करने का बहुत प्रयास किया और जिसमें वह
प्राणघातक रूप से घायल हो गया। रावण सीता को अपने पुष्पक विमान से उड़ा कर
लंका ले गया और उन्हें राक्षसीयो की कड़ी सुरक्षा में लंका के अशोक वाटिका
में डाल दिया। फिर रावण ने माता सीता के सामने उनसे विवाह करने की इच्छा
प्रकट की, लेकिन माता सीता अपने पति भगवान राम के प्रति समर्पण होने के
कारण रावण से विवाह करने के लिए मना कर दिया। इधर भगवान राम और लक्ष्मण
माता सीता के अपहरण के बाद उनकी खोज करते हुए जटायु से मिले, तब उन्हें पता
चला कि उनकी पत्नी सीता को लंकापति रावण उठाकर ले गया है। तब वह दोनों भाई
सीता को बचाने के लिए निकल पड़े, भगवान राम और लक्ष्मण जब माता सीता की
खोज कर रहे थे तब उनकी मुलाकात राक्षस कबंध और परम तपस्वी साध्वी शबरी से
हुई। उन दोनों ने उन्हें सुग्रीव और हनुमान तक पहुंचाया और सुग्रीव से
मित्रता करने की सुझाव दिया।
किष्किंधा कांड Kishkindha Kanda
रामायण में वर्णित किष्किंधाकांड वानरों के गढ़ पर आधारित है। भगवान राम वहां पर अपने सबसे बड़े भक्त हनुमान से मिले। महाबली हनुमान
वानरों में से सबसे महान नायक और सुग्रीव के पक्षपाती थे जिनको की
किसकिंधा के सिहासन से भगा दिया गया था। हनुमान की मदद से भगवान राम और
सुग्रीव की मित्रता हो गई और फिर सुग्रीव ने भगवान राम से अपने भाई बाली को
मारने में उनसे मदद मांगी। तब भगवान राम ने बाली का वध किया और फिर से
सुग्रीव को किसकिंधा का सिहासन मिल गया, और बदले में सुग्रीव ने भगवान राम
को उनकी पत्नी माता सीता को खोजने में सहायता करने का वचन दिया।
हालांकि कुछ समय तक सुग्रीव अपने वचन को भूल कर अपनी शक्तियों और राजसुख का
मजा लेने में मग्न हो गया, तब बाली की पत्नी तारा ने इस बात की खबर
लक्ष्मण को दी, और लक्ष्मण ने सुग्रीव को संदेशा भेजवाया कि अगर वह अपना
वचन भूल गया है तो वह वानर गढ़ को तबाह कर देंगे। तब सुग्रीव को अपना वचन
याद आया और वह लक्ष्मण की बात मानते हुए अपने वानर के दलों को संसार के
चारों कोनों में माता सीता की खोज में भेज दिया। उत्तर, पश्चिम और पूर्व दल
के वानर खोजकर्ता खाली हाथ वापस लौट आए। दक्षिण दिशा का खोज दल अंगद और
हनुमान के नेतृत्व में था, और वह सभी सागर के किनारे जाकर रुक गए। तब अंगद
और हनुमान को जटायु का बड़ा भाई संपाती से यह सूचना मिली कि माता सीता को
लंकापति नरेश रावण बलपूर्वक लंका ले गया है।
सुंदरकांड Sundara Kanda
जटायु के भाई संपाती से माता सीता के बारे में खबर मिलते ही हनुमान जी ने
अपना विशाल रूप धारण किया और विशाल समुद्र को पार कर लंका पहुंच गए। हनुमान
जी लंका पहुंच कर वहां माता सीता की खोज शुरू कर दी लंका में बहुत खोजने
के बाद हनुमान को सीता अशोक वाटिका में मिली। जहां पर रावण के बहुत सारी
राक्षसी दासियां माता सीता को रावण से विवाह करने के लिए बाध्य कर रही थी।
सभी राक्षसी दासियों के चले जाने के बाद हनुमान माता सीता तक पहुंचे और
उनको भगवान राम की अंगूठी दे कर अपने राम भक्त होने का पहचान कराया। हनुमान
जी ने माता सीता को भगवान राम के पास ले जाने को कहा, लेकिन माता सीता ने
यह कहकर इंकार कर दिया कि भगवान राम के अलावा वह किसी और नर को स्पर्श करने
की अनुमति नहीं देगी, माता सीता ने कहा कि प्रभु राम उन्हें खुद लेने
आएंगे और अपने अपमान का बदला लेंगे।
फिर हनुमान जी माता सीता से आज्ञा लेकर अशोक वाटिका में पेड़ों को उखाड़ना
और तबाह करना शुरू कर देते हैं इसी बीच हनुमान जी रावण के 1 पुत्र अक्षय
कुमार का भी बद्ध कर देते हैं। तब रावण का दूसरा पुत्र मेघनाथ हनुमान जी को
बंदी बनाकर रावण के समक्ष दरबार में हाजिर करता है। हनुमान जी रावण के
दरबार में रावण के समक्ष भगवान राम की पत्नी सीता को छोड़ने के लिए रावण को
बहुत समझाते हैं। रावण क्रोधित होकर हनुमान जी की पूंछ में आग लगाने का
आदेश देता है, हनुमान जी की पूंछ में आग लगते हैं वह उछलते हुए एक महल से
दूसरे महल, एक छत से दूसरी छत पर जाकर पूरी लंका नगरी में आग लगा देते हैं।
और वापस विशाल रूप धारण कर किष्किंधा पहुंच जाते हैं, वहां पहुंचकर हनुमान
जी भगवान राम और लक्ष्मण को माता सीता की सारी सूचना देते हैं।
लंका कांड Yuddha Kanda
लंका कांड (युद्ध कांड) में भगवान राम की सेना और रावण की सेना के बीच
युद्ध को दर्शाया गया है। भगवान राम को जब अपनी पत्नी माता सीता की सूचना
हनुमान से प्राप्त होती है तब भगवान राम और लक्ष्मण अपने साथियों और वानर
दल के साथ दक्षिणी समुंद्र के किनारे पर पहुंचते हैं। वहीं पर भगवान राम की
मुलाकात रावण के भेदी भाई विभीषण से होती है, जो रावण और लंका की पूरी
जानकारी वह भगवान राम को देते हैं। नल और नील नामक दो वानरों की सहायता से
पूरा वानर दल मिलकर समुद्र को पार करने के लिए रामसेतु का निर्माण करते
हैं, ताकि भगवान राम और उनकी वानर सेना लंका तक पहुंच सके। लंका पहुंचने के
बाद भगवान राम और लंकापति रावण का भीषण युद्ध हुआ, जिसमें भगवान राम ने
रावण का वध कर दिया। इसके बाद प्रभु राम ने विभीषण को लंका का सिहासन पर
बिठा दिया।








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